Wednesday, June 2, 2010

शाम से सुबह

दूर शाम के धुंधलके में,
कुछ अक्स उभरे|
कुछ सपने टूटे,
कुछ सच उभरे|
रात के अन्धकार ने समेटा,
टूटे सपनो के टूकड़ों को,
सुबह लायी नया दिन,
नयी शुरुआत कर जाने को,
और कुछ नए सपने,
सच कर दिखने को|

2 comments:

  1. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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